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Saturday, June 12, 2010

न सावन हरे न भादों सूखे


(इस रचना में मुहावरों और प्रचलित लोकोक्तियों का भरपूर प्रयोग किया गया है)

ज्योंही श्रीमान नाथूराम चूरन प्रसाद नाई की दूकान से सर मुंडवा कर निकले त्योंही आसमान से ओले बरस पड़े | अब गली-कूचो से तमाशा देख रहे बच्चे हँसते-हँसते लोटपोट हो गए| लेकिन हमारे गाँधी-भक्त चूरन प्रसाद जी आँखें फेरकर गुस्सा पी गए| नाथूराम जी इधर-उधर की हांकने के बजाये बड़े ही शांत स्वाभाव के व्यक्ति ठहरे| किसी के कान भरना किसी पर कीचड उछालना या किसी की राह में कांटे बिछाकर अपना कलेजा ठंडा करना उनकी बस की बात कहाँ ! वो बस अपनी खिचड़ी अलग ही पकाते|

टपाटप ओलों से होती दुर्दशा देख खान चाचा ने उन्हें अपनी छतरी के नीचे सर छुपाने का आमंत्रण दिया| ज्यादा अगर-मगर न करते हुए वह खान चाचा की बात मन गए| मुंह से निकला 'थैंक यू' जो किसी गागर में सागर से कम थोड़े ही था| "मियां अब तो ईद का चाँद हो गए हो, अब तो चिराग लेकर ढूढना पड़ता है|"

"बस यूं ही" दो टूक जवाब दे दिया|

"फिर भी सावन में बाल हटवा कर उलटी गंगा क्यों बहा रहे हो?" खान चाचा ने पूछा| पहले तो नाथू राम जी ने आँखें चुरा ली फिर दबे स्वर में बोले- "शोक में"|

"अमां किसके शोक में? "

"मेरे साले के ससुर के चाचा के पुत्र के बहनोई चल बसे"| "ओह हो हो" खान चाचा को मिटटी के माधो नाथू राम पर खूब हंसी आई परन्तु हवा का रुख पहचानते हुए बोले- " या अल्लाह! अनहोनी कब हो जाये पता नहीं चलता| बहुत ही करीबी रिश्तेदार मालूम पड़ते थे|"

"नहीं| लेकिन जब सभी उनके स्वर्ग सिधारने पर सब फूले नहीं समा रहे तो मैंने सोचा मैं ही शोक मन लूँ|"

"ख़ुशी? भई क्यों?"

"असहनीय कवि थे - नाम था छप्पन भोग" नाथू राम बताने लगे-

"पर ऊँची दुकान फीका पकवान| जहाँ जाते वही जीत आते क्यूंकि बाकी सभी कवि रफूचक्कर हो जाते| उनकी कवितायें भी ढाक के तीन पात सामान होती|
एक महाकाव्य संगोष्ठी में कविता की कुछ मुरझाई पंक्तियाँ ऐसे सुनाई-
दिल में लगी सुई ...दिल में लगी सुई
ऊई ऊई उई ....

उनके कवि सम्मेलनों में तांता बंधने के बजाय आयोजको के लिए भागने और डूब मरने की नौबत आ जाती| कोई भी उनकी कविताओं की धज्जियाँ न उड़ा पाता| बस सब दुम दबाकर भाग खड़े होते| न तो वे किसी निन्यानवे के फेर में पड़े थे न ही किसी को नीचा दिखाना चाहते थे बस कविता-रुपी परायी आग में कूदना चाहते थे| फिर भी घरवालों और पड़ोसियों की नींद हराम कर दी| घरवालो और श्रोताओं ने उनके स्वर्ग सिधारने की प्रार्थना ही नहीं प्रयत्न भी किये|

खूब पापड़ बेले, खून-पसीना एक किया| यहाँ तक की धरना भी दिया| ज़हर देते तो उनका उपवास हो जाता , सुपारी देते तो किसी और बन्दे का नामो-निशां मिट जाता परन्तु छप्पन जी का बाल भी बांका न होता| जाको राखे साईयाँ मार सके न कोय |"

"फिर काल के ग्रास में कैसे समाये?" खान चाचा ने पूछा|

" कविता के चक्कर में ही! बालकनी में बैठे कविता लिख रहे थे| एक तेज़ हवा का झोंका आया और सारे कागज़ उड़ा ले गया| जान से ज्यादा प्यारी कविता की यह दशा देखी न गयी| खुद भी सांतवे माले से 'बंजी-जम्प' कर बैठे बिना रस्सी के|

होनहार बिरवान के होत चिकने पात| हाथ में कविता का कागज़ तो आया पर फिर कभी होश नहीं आया|

कविता की हृदयस्पर्शी पंक्तियाँ कुछ यूं थी-
साल बीत जाता है
फिर आती है होली
तंगहाली कम न थी
उसपर भी तुमने कुर्ती भिगोली
अब सर्फ़ पावडर कहाँ से लाऊंगा?
घडी डीटरजेंट से ही काम चलाऊंगा"

घर पहुँच कर खान चाचा विचारने लगे- नाथूराम का पूरा कुनबा ही विचित्र है- न सावन हरे न भादों सूखे|

6 comments:

  1. bahut badiya. achchhi rachana lagi.

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  2. आईये जानें .... क्या हम मन के गुलाम हैं!

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  3. सार्थक पोस्ट

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  4. मुहावरों का बढिया प्रयोग ..

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  5. बढ़िया चित्रण नाथूराम जी का...अच्छा लगा ...धन्यवाद

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  6. good attempt :) can u provide me yr email address? plz mail me at gopalbkn1@gmail.com

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