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Wednesday, March 28, 2012

रेखाएं
सीमान्त की धुरी पर
सीधी समझ से परे झुककर
उलझ कर बन जायें
वक्र

कैद

मन के रूपक
में व्यक्त होती विषयी
सूक्ष्म लौ में जलती
उन्मुक्त

एकतरफा
ओस से भीगा
नैसर्गिक उन्माद के आवेश में
पेड़ पर आये पत्तों सा
स्वाभाविक

विश्वास
संवेदना के अक्ष पर
झूलता डगमगाता विधि के
दोराहों पर चुनता
आघात

2 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 09 दिसंबर 2017 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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